District Bhind Madhya Pradesh By Apurv Gavsindhe
जिला भिंड मध्य प्रदेश - अपूर्व गावसिंधे
District Bhind Madhya Pradesh By Apurv Gavsindhe
यह सर्बविदित तथ्य है युगों से भिंड डकैतों, लुटेरों या ठगों की लूटमार से ग्रस्त रहा है । भव्य चंबल, घुमावदार गहरे व चौड़े गह्वर, भयावह बीहड़ दस्यु-अनुकूल आदर्श वातावरण सुलभ कराते रहे हैं l मुगल काल के दौरान भी शक्तिशाली प्रशासन इन खतरों को रोकने में विफल रहा । 1959 से 1963 के दौरान अकेले भिंड जिले में 216 डाकू मार गिराए गए और 697 गिरफ्तार किए गए।
भिंड जिले का क्षेत्रफल 4459 वर्ग किलोमीटर तथा 2001 की जनगणना के अनुसार कुल अवादी 14,28,559 है l जिले की आबादी राज्य की कुल आवादी का 2% है तथा जनसंख्या रैंकिंग में इसका 20 वां स्थान है । 2001 की जनगणना के अनुसार जिले का लिंगानुपात 829 है। ग्रामीण क्षेत्र का लिंगानुपात 825 है जबकि शहरी का 843 । लिंग अनुपात का आशय प्रति 1000 पुरुषों के विरुद्ध महिलाओं की संख्या है।
भिंड की मिट्टी बहुत उपजाऊ है जो चंबल और सिंध नदियों और सहायक धाराओं, यथा क्वारी व पहुज से सिंचित होती है।
भोगोलिकी
जिले की रूपरेखा :
ग्वालियर के उत्तर – पूर्व में 26 ° 34’50 “अक्षांश और 78 ° 48’05” रेखांश पर अवस्थित भिंड मध्य प्रदेश का सबसे उत्तरी जिला है । यह क्वारी तथा पहुज नदियों के मध्य चंबल और सिंध की घाटियों में स्थित है। जिला 25 ° 54’5 ” उत्तर से 26 ° 47’50 ” उत्तर और 78 ° 12’45 ‘पूर्व से लेकर 79 ° 8’30’ ’79 डिग्री 8’30’ ‘पूर्व तक फैला हुआ है ।
उत्तर पूर्व की तरफ उभरा हुआ यह जिला अर्धवृत्ताकार है । भिंड जिले की सबसे बड़ी लंबाई दक्षिण पूर्व से उत्तर पश्चिम तक 105 किमी है l
भिंड जिला उत्तर दिशा में उत्तर प्रदेश के आगरा और इटावा जिलों और दक्षिण में ग्वालियर और दतिया जिलों से घिरा हुआ है । इसकी पूर्वी सीमा उत्तर प्रदेश के इटावा, औरैया और जालौन जिलों द्वारा बंद की जाती है जबकि पश्चिमी और उत्तर पश्चिमी सीमाएं मुरैना जिले द्वारा साझा की जाती हैं। उत्तर पश्चिमी सीमा आसन और क्वारी नदियों द्वारा चिह्नित की जाती है तथा उत्तरी और पूर्वी पर चंबल और पहुज नदियाँ बहती हैं।
भूगोल :
सम्पूर्ण जिला चंबल घाटी में अवस्थित है l यह गंगा घाटी के दक्षिण – पश्चिमी भाग का निर्माण करता है l पहाड़िया नाम मात्र को है जो मुख्यतः दक्षिण – पश्चिम में छोटी-छोटी और अलग-अलग हैं ।
यह केवल भिंड तहसील में है कि नदियों का प्रवाह पूर्व की तरफ है l भिंड की स्थलाकृति घाटी – मैदानी स्थलाकृति है । वर्तमान में मैदानी भाग पर खेती होती हैं l खेत प्रायः ब्रक्षविहीन तथा नमीदार स्थानों पर झाड़ियों से युक्त हैं l स्थलाकृति को विभाजित करने वाला गहरी खाड़ियों तथा ढालू किनारों से युक्त केवल नदियों का नेटवर्क है ।
जिले का सबसे विस्तृत मैदान गोहद, मेहगाँव और मौ के आसपास के पश्चिमी भाग में स्थित है। बीहड़ी भूमि नदियों एवं उनकी सहायक नदियों के दोनों तरफ फ़ैली हुई है l ये बीहड़ डकैतों की आदर्श शरणस्थली तथा बाख निकालने के रास्ते रहे हैं l घाटी क्षेत्रों में खेती और बस्तियों के लिए ज्यादातर अनुपयुक्त हैं।
कई नदियाँ तथा जलधाराएं जिले से होकर बहती हैं l चंबल और सिंध जिले की प्रमुख नदियां हैं। चंबल उत्तरी सीमा का निर्माण करती है l चूंकि 2 नदियां यमुना की उपनदियां हैं, वे गंगा जल निकासी व्यवस्था के कुछ हिस्से बनातीं हैं । इनके अतिरिक्त, क्वारी,पहुज, आसन और वैसली जिले की अन्य महत्वपूर्ण नदियां हैं ।
जलवायु :
दक्षिण-पश्चिमी मानसून मौसम के अलावा भिंड का मौसम सामान्य तौर से सूखा रहता है। वर्ष को 4 ऋतुओं में विभाजित किया जा सकता है l शरद ऋतु दिसंबर से फरवरी तक और ग्रीष्म ऋतु मार्च से लगभग मध्य जून तक रहती हैं । जून के मध्य से सितंबर के अंत तक की अवधि दक्षिण-पश्चिम मानसून के मौसम है। अक्टूबर और नवंबर मानसूनोत्तर माह हैं l
बर्षा :
भिंड की औसत वार्षिक वर्षा 668.3 मिमी है। जिले की स्थानिक भिन्नता बहुत अधिक नहीं है। दक्षिण-पश्चिम मानसून के महीनों में वार्षिक वर्षा का लगभग 92% प्राप्त होता है। औसतन एक वर्ष में 33 बरसात के दिन होते हैं। 6 सितंबर, 1910 को भिंड में जिले में किसी भी स्थान पर दर्ज 24 घंटों में सबसे भारी वर्षा 295.9 मिमी थी।
तापमान :
भिंड में कोई मौसम संबंधी वेधशाला नहीं है l फरवरी के बाद तापमान मई तक लगातार बढ़ता है जब औसत दैनिक तापमान 46 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम 28 डिग्री सेल्सियस रहता है। जून में औसत तापमान दो डिग्री से अधिक हो सकता है। गर्मियों में अति तीव्र गर्मी होती है और अक्सर चलने वाली धूल भरी व झुलसाने वाली हवाएं अति कष्टकारी होती हैं । जून के मध्य में मॉनसून की शुरूआत के साथ तापमान में एक सुखद गिरावट आती है। अक्टूबर के बाद दिन और रात के तापमान में तेजी से गिरावट आती है l अधिकतम औसत तापमान 23 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम औसत तापमान 5 डिग्री सेल्सियस के साथ जनवरी सबसे ठंडा महीना है l 2003 में न्यूनतम तापमान 2-3 डिग्री सेल्सियस तक गिर गया था l ठंड के मौसम में पश्चिमी हवायेन एवं शीत लहर जिले को प्रभावित करती हैं और न्यूनतम तापमान पानी के हिमांक से भी लगभग एक डिग्री नीचे गिर जाता है।
इतिहास
संयुक्त मध्य भारत का उद्घाटन तत्कालीन प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा 28 अप्रैल 1 9 48 को ग्वालियर में किया गया। सिंधिया और होलकर को क्रमशः राजप्रमुख और उप-राजप्रमुख के रूप में शपथ दिलाई गई । संयुक्त मध्य भारत को 6 जिलों में विभाजित करने का निर्णय लिया गया और भिंड उनमें से एक था। नवंबर 1956 में नए मध्यप्रदेश के गठन पर राज्यों के पुनर्गठन के परिणामस्वरूप, भिंड जिला नए मध्य प्रदेश का एक हिस्सा बन गया।
पौराणिक भिंड : महाभारत युद्ध के दौरान यमुना और विन्ध्य के मध्य पुरे क्षेत्र में चेदियों का निबास था l राजा कासु चैद्य (महाभारत में वासु के नाम से प्रख्यात) का उल्लेख ऋग्वेद में दानस्तुति के एक श्लोक में किया गया है l पौराणिक साहित्य ने इन चेदियों को यदुओं के वंशज के रूप में प्रस्तुत किया है । पौराणिक परंपरा के अनुसार मनु के पौत्र पुरुर्वा जो चन्द्रवंश के संस्थापक हैं, ने कदाचित मालवा एवं पूर्वी राजपुताना और संभवत: भिंड जिले को भी घेरते हुए अपने साम्राज्य का बिस्तार गंगा के दोआब में किया । उनके प्रपौत्र अयाति ने पूरे मध्यदेश और आसपास के क्षेत्र को कम कर दिया । उनके बाद उनके पुत्र यादवों के जनक यदु चंबल, बेतवा और केन नदियों से सिंचित क्षेत्र के राजा बन गए । ह्यैयाओं द्वारा यदुओं को उखाड़ फेंका गया और ह्यैयाओं को विदर्भ के यदुओं द्वारा नष्ट नाबूद कर दिया गया l राजघराने के कृष्ण नाम का एक सदस्य चेदि – देश जिसमे यमुना के दक्षिण तथा केन एवं चम्बल के मध्य की भूमि सम्मिलित थी, का राजा बन गया l इस प्रकार भिंड जिला आर्यों के अधीन आ गया l चेदि देश का पौराणिक सूची में उल्लेख है l 6 वीं सदी ईसा पूर्व में यह सोलह महाजनपदों में से एक था। कुछ समय बाद यादव वंश का चेदि राजा को हस्तिनापुर के राजा कुरुके एक वंशज बासु द्वारा परास्त कर दिया गया । कुछ पीढ़ियों के बाद इस वंश का चेदि राजा शिशुपाल था, जिसने भगवान कृष्ण को पांडवों के राजसूय यज्ञ के दौरान गालियाँ दी थीं और जिसका वध श्रीकृष्ण द्वारा इंद्रप्रस्थ में किया गया था ।
नंदवंश : 4 वीं शताब्दी ईस्वी में सम्पूर्ण आर्यवर्त्य को नंदों के विशाल साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया गया था। पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार नन्द वंश के संस्थापक महापद्मनन्द ने सभी क्षत्रपों का विनाश किया और एकक्षत्र शासक बन गए l
मौर्य : अशोक के शिलालेखों के वितरण से पता चलता है कि तीसरी सदी ईसा पूर्व में वह एक विशाल साम्राज्य जिसमे विल्कुल दक्षिण के चार राज्यों को छोड़कर पूरा भारतबर्ष था, का स्वामी था l गूजर में विद्यमान अशोक का शिलालेख (आसन्न दातिया जिले में) इस क्षेत्र से मौर्यों के घनिष्ठ संबंधों को प्रमाणित करता है l अशोक ने अपना साम्राज्य अपने पिता बिन्दुसार और बाबा चन्द्रगुप्त मौर्य से प्राप्त किया था l 

शुंग : मौर्यवंश का अंतिम शासक ब्रहद्रध की हत्या उसके ही मंत्री पुष्यमित्र द्वारा 187 ई.पू. में कर दी गई और मौर्य शासन के मध्य भाग में शुंग वंश की स्थापना हुई l शुंग राजाओं की दूसरी राजधानी विदिशा थी।
आरंभिक नागा : प्रथम ईसवी बर्ष में ग्वालियर क्षेत्र आरंभिक नागाओं के शासन के अधीन था। पद्मावती (ग्वालियर जिले में), मथुरा और कांतीपुरी (मुरेना जिला) इन नागा शासकों की तीन शाखाओं के मुख्यालय थे। बाद में कुषाणों ने इन नागाओं को अपने अधीन कर लिया ।
कुषाण : कनिष्क कुषाण सम्राटों में से सबसे महान था l उसका साम्राज्य बिहार में पूर्व से खुरासन पश्चिम तक, उत्तर में खोटण से लेकर दक्षिण में कोकण तक से लेकर मध्यदेश, उत्तरपथ और प्राचीन भारत के अपरांतक क्षेत्रों तक फैला हुआ था l इस प्रकार भिंड जिला कुशाण साम्राज्य में शामिल था l वासुदेव के शासनकाल के बाद इस क्षेत्र में कुशाण सत्ता का पतन हो गया । उनका स्थान नागाओं द्वारा पुनः ले लिया गया जो तृतीय एवं चतुर्थ इसवी तक इस क्षेत्र में राजनीतिक रूप से प्रभावी रहे ।
नागा : आरंभिक नागाओं के सामान बाद के नागा शासक तीन आश्रमों – मथुरा, कान्तिपुरी एवं पद्मावती के थे और इन्होने पद्मावती, मथुरा एवं विदिशा के आसपास के क्षेत्रों पर शासन किया l कॉपर से निर्मित विभिन्न प्रकार के 270 तावें के लगभग 270 सिक्के जो नागाओं से सम्बंधित हैं, अकोड़ा जिला भिंड से एकत्रित किये गए l कुछ सिक्के गोहद में भी प्राप्त हुए हैं l
गुप्त : चौथी शताब्दी के मध्य में नागा साम्राज्य गुप्त संप्रभुता के अधीन हो गया।
हूण : भानुगुप्त ( 495 – 510 ई.) के शासनकाल के दौरान अथवा उसके सिंघासनारूढ होने से कुछ पूर्व हूण सेनापति तोरमाण के आक्रमण ने गुप्त साम्राज्य को तेजी से समाप्त कर दिया l हूण साम्राज्य में पंजाब से लेकर मध्य एशिया का क्षेत्र सम्मिलित था l यहाँ तक कि मगध, कौशाम्वी एवं काशी तक हूणों के अधीन थे l
वर्धन राजवंश : 7 वीं शताब्दी की शुरूआत में विज्ञापन हर्षवर्धन थानेश्वर के सिंहासन पर बैठा और कन्नौज का राजा बन गया । इस राजवंश के शासन काल में बौद्ध धर्म का बिकास हुआ ।
गुर्जर प्रतिहार : 8 वीं शताब्दी में 726 – 50 ई. के मध्य मालवा के साथ-साथ यह क्षेत्र गुर्जर प्रतिहारों की एक शाखा के राजवंश के शासनाधीन आ गया ।
कच्छपघात : वज्रदमन ने लगभग 977 ई. में धंग के लिए ग्वालियर किले पर विजय प्राप्त की । तत्पश्चात उसके राजवंश ने बाराहबीं शताब्दी के प्रारम्भिक बर्षों तक ग्वालियर क्षेत्र पर शासन किया ।
सल्तनत काल :यह क्षेत्र दिल्ली के सुल्तानों के अधीन आ गया । वर्ष 1195 – 96 में मोहम्मद गौरी ने सुलक्षणपाल पर हमला किया l ग्वालियर के प्रतिहार अधिपति ने गौरी की संप्रभुता स्वीकार कर ली जिसके कारण उसे इस क्षेत्र पर शासन करने की अनुमति दे दी गई ।
शूर राजवंश : बाद में यह क्षेत्र शूर राजवंश के प्रभाव में आया था।
मुगल : भिंड जिला आगरा सूबा में आगरा सरकार का बड़ा भाग था । जिले में मुख्य रूप से हथकंट का महल था जिसमें ईंटों का किला था । मुगल शासन 18 वीं शताब्दी की शुरुआत तक जारी रहा । गोहद नगर जो अब भिंड जिले का हिस्सा है, की बुनियाद एक जाट परिवार द्वारा डाली गई थी । 17 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जाट परिवार द्वारा इस शहर के आसपास के इलाके पर कब्जा कर लिया गया । लगभग 1736 ईस्वी में, बाजीराव प्रथम की अगुआई में मराठा सेना ने भदावर के राजा पर हमला कर दिया और युद्ध लड़कर उसके क्षेत्र को तबाह कर दिया । 1737 में पुनः मल्हार राव होल्कर ने भदावर के राजा के क्षेत्र पर हमला किया और उसके गढ़ पर कब्ज़ा कर लिया।
मुगल काल के बाद : नवंबर 1805 में सिंधिया एवं कार्नवालिस प्रथम के साथ संपन्न हुई एक और संधि के तहत अंग्रेज़ों ने गिर्द गोहद, परगना भिंड और इसकी गढ़ियों सहित ग्वालियर और गोहद के गढ़ महाराजा दौलत राव सिंधिया (1784-1827) को सौंप दिए गए l यहाँ से भिंड जिले का इतिहास ग्वालियर के इतिहास के साथ मिल जाता है । सन 1827 ई. में दौलत राव सिंधिया का निधन हो गया और इसके बाद उत्तराधिकार में नाबालिग दत्तक मुगत राव उर्फ़ जानकोजी गद्दी पर बैठे । इनके बाद जयाजी राव ने शासन किया l 1857 के विद्रोह (सैनिक विद्रोह) के बाद रानी लक्ष्मी बाई, राव साहब एवं तात्या टोपे की संयुक्त सेना ने सन 1858 ई. में ग्वालियर पर आक्रमण किया l तभी अंग्रेजों ने ग्वालियर के किले पर धावा बोल दिया और जून 18, 1858 को इसे अपने कब्ज़े में ले लिया । मार्च 1886 में यह सिंधिया को दे दिया गया । अपने पुत्र माधव राव सिंधिया को उत्तराधिकारी के रूप में छोड़ कर जीवाजी राव सिंधिया का सन 1886 ई. में निधन हो गया l राव सिंधिया को शासन करने के अधिकार 15 दिसंबर 1894 को प्राप्त हुए l उनके शासन की अवधि समेकन और स्थिर प्रगति के रूप में वर्णित है। ग्वालियर से भिंड तक ग्वालियर लाइट रेल का निर्माण 1897 में किया गया था और 1899 में शुरू किया गया । 5 जून 1925 को उनका निधन हो गया । इनके उत्तराधिकारी जीवाजी राव सिंधिया हुए । इनके समय में स्वतंत्रता आंदोलन मजबूत हो गया था । 28 अप्रैल, 1948 को जवाहर लाल नेहरु द्वारा ग्वालियर में संयुक्त राज्य मध्य भारत का औपचारिक उद्घाटन किया गया l सिंधिया एवं होल्कर को क्रमशः राजप्रमुख एवं उपराजप्रमुख की शपथ दिलाई गई l भिंड मध्य भारत के 06 जिलों में से एक था ।

बाजरा
आज से लगभग तीन दशक पूर्व भिण्ड जिले का पूरा भूभाग बर्षा के पानी के ऊपर निर्भर था इसलिए यहॉं के किसान उन फसलों को तरजीह देते थे जिनको सिंचाई की जरूरत न हो अतएव बाजरा की फसल यहॉं के किसानो की पहली पंसद रही है। इस क्षेत्र में पैदा होने वाला बाजरा दूर- दूर तक मशहूर है। यहॉं के लोग बाजरा का उपयोग भिन्न-भिन्न प्रकार के खाद्ध पदार्थ व पकवान यथा बाजरा के लडडू, बाजरा की रोटी, महेरी इत्यादि बनाकर करते है l
गेहुँ
यद्यपि भिण्ड का एक बडा भूभाग बीहड है तथापि अधिकांश भाग समतल है। पूर्व में सिंचाई के साधन नही थे परंतु गत सहस्राब्दि के अंतिम दशक से सिंचाई के साधन विकसित होने के फलस्वधरूप भिण्ड के समतल भूभाग पर बडी मात्रा में गेहुँ का उत्पादन होता है। सरसों के बाद यह भिण्ड की सर्वोच्च उपज है यहॉं के गेहुँ की गुणवत्ता शरबती गेहुँ के बाद सबसे अधिक पसंद की जाती है ।
सरसों
भिण्ड अंचल की जलवायु सरसों की उपज के लिए सबसे अधिक उपयुक्त है सरसों की फसल के समय इस क्षेत्र के खेत पीली चादर से ढके हुऐ प्रतीत होते है इसीलिए भिण्ड के परिपेक्ष में सरसों को पीली सोना की संज्ञा भी दी जाती है सरसों इस क्षेत्र के किसानो की अर्थव्यवस्था की मेरूदन्ड है। सरसों पर शोध तथा अनुसंधान कर्ताओ ने पाया है कि भिण्ड जिले की सरसों के तेल की गुणवत्ता तथा तुलनात्मक परिमाण अन्य क्षेत्रो की सरसों से कही बेहतर है भिण्ड जिले में सरसों के खाध तेल के अनेक आधुनिक मिल है जिनके तेल की पूरे देश में मॉंग है।
रुचि के स्थान
- अटेर का किला : इसका निर्माण भदौरिया राजा बदन सिंह, महा सिंह और बखत सिंह द्वारा 1664-1668 के काल में किया गया था इनके नाम पर इस क्षेत्र को “भदावर” के नाम से जाना जाता है l यह चंबल की गहरी वादियों के अन्दर स्थित है l वर्तमान में यह खंडहर की अवस्था में है l यह भिंड शहर के पश्चिम में 35 किलोमीटर दूर स्थित है। यहाँ जाने के लिए प्रातः 6 बजे से सायं 4 बजे तक परिवहन उपलब्ध रहता है l यहाँ बस या जीप जो अटेर रोड / बस स्टैण्ड पर उपलब्ध रहती हैं, से आसानी से जाया जा सकता है l ‘खूनी दरवाजा’, ‘बदन सिंह का महल’, ‘हथियापुर’, ‘राजा का बंगला’, ‘रानी का बंगला ‘और’ बारह खंबा महल’ किले के मुख्य आकर्षण हैं
- भिंड शहर में स्थित एक अन्य किला भी भदौरिया राजा द्वारा विद्रोहियों पर नियंत्रण रखने के लिए बर्ष 1654-1684 के काल में बनवाया गया था । सिंधिया शासन के दौरान दरबार हॉल का निर्माण किया गया था जिसमें वर्तमान में जिला आर्कियोलॉजिकल एसोसिएशन भिंड (म..प्र.) द्वारा संग्रहालय चलाया जा रहा है
- वनखंडेश्वर मंदिर : यह भिंड शहर में स्थित है। इस शिव मंदिर का निर्माण बर्ष 1175 ई. में राजा प्रथ्वीराज चौहान द्वारा कराया गया था । यह कहा जाता है कि तब से “अखण्ड ज्योति” निरंतर प्रज्वलित हो रही है ।
- बरासों के जैन मंदिर : ये प्राचीन मंदिर हैं और इनका अस्तित्व इस क्षेत्र में भगवान महावीर स्वामी की यात्रा के परिणामस्वरूप है । ये मंदिर भिंड – ग्वालियर रोड पर भिंड के दक्षिण पूर्व में लगभग 5 किलोमीटर दूर स्थित है। परिवहन के लिए उपलब्ध साधन केवल ऑटो टैक्सी या निजी वाहन है।
- जमदारा में माता रेणुका मंदिर :यह मौ के निकट गोहद तहसील में स्थित है और कहा जाता है कि यह महर्षि परशुराम का जन्मस्थल है। परशुराम से जुड़ी लोककथा है कि उनके पिता ने माता रेणुका के सिर को काटने का आदेश दिया था जिसका उन्होंने पालन किया और पुरुष्कार स्वरुप अपने पिता से माता रेणुका का पुनर्जीवन माँगा जिसको पिता जम्दगिनी ने स्वीकार कर लिया l इसी घटना स्थल पर मंदिर का निर्माण किया गया । मन्दिर में देवी माता रेणुका की मूर्ति जिसका सिर धड से कटा हुआ है ।
- नारद देव मंदिर : सिंध के नदी के किनारे पर स्थित यह एक शिव मंदिर है । यह अति प्राचीन है और महर्षि नारद ने यहां पूजा की थी । इसे पुनरोद्धार किया जा रहा है l
- गोहद का किला : यह किला 16 वीं शताब्दी में जाट राजा महा सिंह द्वारा बनवाया गया था । किला खंडहर हो चूका है लेकिन महल में अभी भी कई सरकारी कार्यालय संचालित हो रहे हैं l महल की सुन्दर नक्काशी अभी भी देखने लायक है । ‘कछारी महल’ ईरानी कला का एक अनोखा उदाहरण है । किले तक कोई भी बस से पहुंच सकता है। इन जगहों के अलावा भिंड में विश्व प्रसिद्ध बीहड़ और वादियाँ देखने लायक हैं जो सदियों से वागियों के लिए अभ्यारण्य रही हैं l पांच नदियों – पहुज, सिंध, क्वारी, चंबल और यमुना जो भिंड या इसके आस-पास बहती हैं, का संगम 2 किलोमीटर के दायरे में होता है जो “पंचनदा” के नाम से प्रसिद्ध है l जिले से ठीक सटा हुआ यह स्थान वास्तव में उत्तर प्रदेश में है लेकिन यह एक दुर्लभ घटना है जहां पांच नदियों का एक ही बिंदु पर एक समय में संगम होता है ।
कैसे पहुंचें
भिंड रेलगाड़ी और बस मार्ग से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है।
हवाई मार्ग द्वारा
भिण्ड में वर्तमान में कोई हवाई अड्डा नहीं है। निकटतम हवाई अड्डा ग्वालियर में है, जो भिण्ड से करीब 75 किमी है।
रेल द्वारा
रेलवे लाइन भिंड को ग्वालियर से जोड़ती है ।
यह लाइन तत्कालीन ग्वालियर रियासत द्वारा बनबाई गई थी और 3 दिसंबर 1899 को खोली गई थी ।
ग्वालियर लाइट रेलवे (जिसे बाद में सिंधिया रियासत रेलवे के रूप में जाना गया ) 30 जून 1913 तक
ग्रेट इंडियन प्रायद्वीप रेलवे कंपनी द्वारा चलाई गई जिसके बाद इसे ग्वालियर दरबार द्वारा ले लिया गया l
यह लाइन 5 नवंबर 1951 को मध्य रेलवे में एकीकृत कर दी गई ।
सड़क के द्वारा
सड़क परिवहन भिंड में परिवहन का मुख्य साधन है।
भिंड का मुख्य लिंक मार्ग इटावा – ग्वालियर राष्ट्रीय राजमार्ग (NH 92) है जो मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को जोड़ता है ।
यह ग्वालियर से 80 किलोमीटर और इटावा से 40 किलोमीटर दूर है।




Comments
Post a Comment